
अपनी बात
जिनके मन में बच्चे होते हैं, उनके हृदय मासूमियत से भरे होते हैं। हैवानियत के लिए फिर कोई स्थान नहीं बचता है। आज समाज में चारों तरफ जो हैवानियत है, कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे भीतर का वह मासूम बच्चा इतना बड़ा हो गया हो कि बुद्धिपूर्ण और चतुराई भरे वातावरण में हमारी संवेदना की ताज़गी, टटकापन और उसकी बाल सुलभ निश्छलता झुलस गयी हो, कहीं ऐसा तो नहीं फूलों की खुशबू, निश्चल किलकारी और मासूम रंगों का अस्तित्व मिटा कर हिंसा और दरिंदगी अपने पैर पसारने का उपक्रम कर रही हो, इन तमाम सवालों से कविता सबसे पहले जूझती है। इस लिए भी कि आदमी से कविता का रिश्ता सबसे नजदीकी का है। यदि यह रिश्ता बना रहा तो समाज निश्चित रूप से सृजन करता रहेगा और विध्वंस के दांत खट्टे करता रहेगा। आखिर, आशा और विश्वास ही तो जीवन के मजबूत आधार होते हैं, और कविता इन्हें पहचानती है ...हम कविता को पहचानते रहें , हम आदमी के बहुत करीब रहेंगे …
महज़ दो कवितायें दे कर आप की संवेदना का साझीदार बनने हेतु प्रयास कर रहा हूँ…आप की प्रतिक्रियाएं मुझमें समझ और विवेक पैदा करेंगी, धन्यवाद।
-सुरेश यादव
दिल में बच्चे


















