इस बार आसमान में
बादल ऐसे आये
सब के सब खाली-खाली
पानी आँखों ने बरसाये
आवाज़ लगाती, प्यासी धरती
सूखे खेत बुलाते
दूर देश ले जाते
ज़हर हवा में तीखा इतना
मौसम सारे भटकाये
मस्जिद में पढ़ी अजानें
घुमड़-घुमड़ कर घने दिखे जो
बादल सब छितराये
कुएं,ताल,खेत, सब सूखे
पशु-पक्षी, बच्चे-बूढ़े सब भूखे
सपनों की फसलें सूख गयीं आँखों में
उड़ानें चिड़ियों की
छिप कर बैठ गईं, बंद-बंद पाखों में
सावन के दिन भी तपे खूब
बादल ने अंगारे बरसाये
इस बार आसमान में
बादल ऐसे छाये .
एक मेला जो हर साल
लगता है
मेले में मुर्गा
दूसरे मुर्गे से लड़ता है
तमाशबीन इस लड़ाई में जब
अपनी खुशियाँ तलाशने लगते हैं
और तालियाँ बजाने लगते हैं
तालियों का ऐसा होता है असर
बिना दुश्मनी के भी मासूम मुर्गे
झपटने लगते हैं एक दूसरे पर मौत बनकर
बंधी जाती हैं छुरियां
बहुत पैनी -- धारदार
तालियों के बीच फिर होती है लड़ाई आर - पार
लहू की बूंदें ,
जितनी ज्यादा गिरती हैं
तालियाँ उतनी जोर से बजती हैं
खून से लथ-पथ बांग मुर्गे की
फिर हिंसक सवेरों को जगाती है
सभ्यता के आँगन में
आदमी को फिर मुर्गा बनाती है
तारीख उस पर तालियाँ बजाती है.
टिटहरी जब
अपने नन्हें-नन्हें पंखों को
उड़ने की खातिर
फैला देती है
इस तरह अपना एक आकाश बना लेती है
टिटहरी
आकाश गिरने के डर से जब
अपने पैरों को ऊपर उठा लेती है
इस तरह
आकाश जितना साहस जुटा लेती है.









