रविवार, 4 अप्रैल 2010

अपनी बात






प्रिय मित्रो . पिछली पोस्टों में आप ने – ‘तुम्हारे हाथों’, ‘सवेरा एक पुल’, ‘शांति के प्रश्न’ ’बर्बर होना’, ‘ज़िन्दगी की लय’, ‘पिंजरा’ और ‘शिकारी का हाथ’ कवितायेँ पढ़ीं. यह पांचवीं पोस्ट अपनी दो कविताओं के साथ आप के सामने ला रहा हूँ -- 'शुरू करो नाटक ' और ‘कटे हाथ’. कुल मिलाकर ये नौ कवितायेँ तीस वर्ष पूर्व रचित एवं प्रकाशित कवितायेँ हैं. समकालीन संवेदना से या कहें सर्वकालीन संवेदना से जुडी होने के अहसास ने आप के सामने रखने को विवश किया और मै आश्वस्त हूँ, आप की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएं पाकर. आशा करता हूँ, आप की बेबाक टिप्पणी प्राप्त होगी जो एक सार्थक रोशनी का काम करेगी.
-सुरेश यादव

कविताएं


शुरू करो नाटक

भूमिका नहीं
अब -
शुरू करो नाटक
बहुत देर हो चुकी है

दर्शकों की भीड़
रह-रह कर
सीधी करने लगी है अपनी रीढ़
उबाऊ हो चली है

जमुहाई लेते हुए
अंगड़ाते घोड़े की मुद्रा में
कुर्सियों के सहारे खड़े हो रहे हैं दर्शक

बिगड़ाने लगे पात्रों के मेकअप
और वे भूलने लगे अपने संवाद

चरित्र घुलने लगे
एक दूसरे में बेताबी से
भूलने लगे अभिनय अपना

भटकती हुई आशंकाएं अब -
दहशत में बदलने लगी हैं
जल्दी शुरू करो नाटक - अब
मुद्राएँ पात्रों की
मूक संवादों में ढलने लगी हैं
0

कटे हाथ

हर बार
कटे हाथों की प्रदर्शनी में
जो लोग खुश होते हैं
और
हंसी के ठहाके भी लगते हैं

उनके अपने कन्धों पर
होते नहीं अक्सर अपने हाथ
इसी मजबूरी में वे-
तालियाँ नहीं बजा पाते हैं.
झूम झूम कर गाते हैं.
00

15 टिप्‍पणियां:

Kulwant Happy ने कहा…

एक माँ के दो बेटे थे, किसी ने पूछा तुम्हें कौन सा प्यारा है। तो माँ के पास जवाब न था।

इसलिए पाठक के लिए दोनों ही बेहद प्यारी रचनाएं हैं। मत पूछिए कौन सी प्यारी है। दोनों ही लाजवाब हैं जी।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

भटकती हुई आशंकाएं अब -
दहशत में बदलने लगी हैं
जल्दी शुरू करो नाटक - अब
मुद्राएँ पात्रों की
मूक संवादों में ढलने लगी हैं

लाज़वाब भाव ..बहुत सुंदर रचना....सुरेश जी क्या कमाल के कविता लिखते है....इस बेहतरीन अभिव्यक्ति के लिए आभार..

कविता कटे हाथ भी बेहतरीन.....बहुत बहुत बधाई

Shekhar kumawat ने कहा…

ji

shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

ashok andrey ने कहा…

priya bhai suresh jee aapki dono kavitaon ne mun ko chhu liya hai lekin doosri kavitaa adbhudh-
unke apne
kandhon par
hote nahee aksar apne
haath
isee majburi men ve-
taaliyan naheen bajaa pate hain.
jhoom jhoom kar gaate hain.
Sundar ati sundar, bechaargi kee kitnee sundar dhang se bhavon ko prosaa hai, badhai.

Shekhar kumawat ने कहा…

ji ham kahna chahte the ki bahut achi kavita he ye

बलराम अग्रवाल ने कहा…

भटकती हुई आशंकाएं अब,दहशत में बदलने लगी हैं--यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि आशाएँ संघर्षशीलता में और आशंकाएँ दहशत में तब्दील होती हैं। 'कटे हाथ' भी झूमने का नाटक करने वाले अभिजात्यों पर करारी चोट करती है। कविता 'शुरू करो नाटक' समझने के लिए जहाँ थोड़ी गहराई की माँग करती है वहीं 'कटे हाथ' का बिंब किंचित आसानी से समझ में आने वाला है।

http://avanishgautam.com/blog/ ने कहा…

सुरेश जी हांलाकि दोनो कविताएं अच्छी है लेकिन मुझे "शुरू करो नाटक" ज्यादा पसन्द आई.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

दहशत और वहशत

शत-प्रतिशत आदत

नहीं होती है बंधु

आदत बना दी

जाती है समाज

अपने द्वारा।

सहज साहित्य ने कहा…

आपकी दोनों कविताएँ मँजी हुई और सधी हुई हैं।

सहज साहित्य ने कहा…

आपकी दोनों कविताएँ मँजी हुई और सधी हुई हैं।

सुनील गज्जाणी ने कहा…

suresh jee , saadar. aap ki dono kavitae acchi lagi, naye pribhasa dikhi. sadhuwad

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

भाई सुरेश ,

आपकी दोनों कविताओं ने मन मोह लिया. शिरू करो नाटक जिन्दगी की हकीकत से रू-ब-रू कराती है वहीं कटे हुए हाथ आभिजात्यता पर गहरा व्यंग्य करती है.

चन्देल

संजय भास्कर ने कहा…

बेहतरीन कविता.....बहुत बहुत बधाई

Devi Nangrani ने कहा…

Bahut hi saskakt Rachnayein man ki parton ko ukerti hui
जलते चूल्हे से भी
खींचकर ले गई तिनका
बुन रही है
नीड़ में जिसको जल्दी-जल्दी !
Daad ke saath
Devi Nangrani

R.Venukumar ने कहा…

भूमिका नहीं
अब -
शुरू करो नाटक
बहुत देर हो चुकी है
भटकती हुई आशंकाएं अब -
दहशत में बदलने लगी हैं
जल्दी शुरू करो नाटक - अब
मुद्राएँ पात्रों की
मूक संवादों में ढलने लगी हैं

हर बार
कटे हाथों की प्रदर्शनी में
जो लोग खुश होते हैं उनके अपने कन्धों पर
होते नहीं अक्सर अपने हाथ



भाई सु.या. सृजन !

अत्यधिक प्रभावशाली कवित्व.. कविता का रस और काव्यात्मा का संपूर्ण दोहन.. मैंने अपने हिसाब से मक्खन निकाल लिया है और मुग्ध हूं।
धन्यवाद