सोमवार, 2 अप्रैल 2012

कविता




अपनी बात

आदमी को अपनी जड़ों से उखाड़ने में जिन विपत्तिओं का हाथ होता है, उनमें गरीबी महत्वपूर्ण स्थान रखती है. उखड़ा हुआ पेड़ और उखड़ा हुआ आदमी, दोनों ही अपने अस्तित्व से जूझते हैं. जैसे पेड़ दूसरी ज़मीन पर जड़ें प्राप्त कर लेता है, आदमी का हाल भी ऐसा ही होता है. संघर्ष का यह समय किसी के भी जीवन की गहन संवेदनाओं से भरा होता है, क्योंकि इसमें बहुत कुछ खोया-पाया जाता है… कवितायें कब संघर्ष की ज़मीन पर फूल की तरह खिल जाती हैं, पता नहीं चलता है ... कुछ पुरानी कवितायें सामने हैं… और आप के सामने रखने की चाहत है…
-सुरेश यादव


चिमनी पर टंगा चाँद

मेरे गाँव के हो तुम

यार - चाँद !

धुएं वाली ऊंची चिमनी पर

टंगा देखा तुम्हें

बहुत दिनों बाद


पहचाने नहीं गए तुम

पी गया लगता है - सारा दूधियापन

यह शहर


तुम हो गये… इतने पीले

सूख कर कांटा मैं भी हुआ

ढ़ोते ढ़ोते वादे सपनीले


याद करो दोस्त

जब हम गाँव से आये थे

बेशक - छूट गए थे खेत

सारस, बया के घोंसले, शिवाले और धुँआते छप्पर

लेकिन -

गोबर सने हाथों राह निहारती आँखें

और मिलकर साथ खेला

चहकता हुआ आकाश

हम साथ लाये थे


बेशक - अक्स चटक कर

इस शहर में

छितरा गए थे मेरी और तुम्हारी तरह!


हमने फिर भी भागती भीड़ में

थोड़े से सपने जिन्दा जरूर बचाए थे


एक दिन मिलो चाँद

इस तरह - किसी थके हुए चौराहे पर

वही अपनी-सी दूधिया हंसी लेकर

मैं भी मिलूँगा तुम्हें

अपने गाँव की तरह

बाँहों में भर कर ।


गरीब गाँव

गरीब हैं, गाँव के लोग

इतने गरीब

जब-जब कोई दूर देश से आता है

राजकुमार हो जाता है


गाँव में आज तक

नहीं हुआ कोई राज कुमार

इस लिए

जो भी आता है


इन्द्रधनुष की तरह

इस आकाश में छा जाता है


'पारस' है इस गाँव में

छू जाता है जब-जब कोई

दूर देश से आकर

वह - 'सोना' हो जाता है


'पारस' तो पत्थर है

पत्थर ही रह जाता है


गाँव - गरीब है इतना

'ब्लैकबोर्ड' की तरह

अमीरी का एक-एक अक्षर यहाँ

खड़िया-सा चमक जाता है ।


गरीब का हुनर

घर - सूखी घास के

छप्पर - फूस के

चूल्हे खुले हुए


पेट की आग बुझाने की खातिर

गरीब - चूल्हे की आग जलाते हैं


हवाएं - बेखौफ चलती हैं

फूस के घरों में

लपटों को ऊंचा उठाती हैं

छप्पर की ओर

चिनगारियां बिखर जाती हैं

साँसें गरीब की सहम जाती हैं


हुनर है - इस गरीब के पास

ऐसा कि

जिस आग से वह घर बचाता है

उसी आग से

वह रोटी भी पकाता है।
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18 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

सभी रचनायें बहुत बढिया हैं।बधाई स्वीकारें।

Mithilesh dubey ने कहा…

सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक , दिल से निकली आवाज को आपने शब्दों में बढ़िया पिरोया है .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सभी रचनाएँ बहुत सुंदर ... चिमनी पर टंगा चाँद बहुत पसंद आई

संजय भास्कर ने कहा…

एक से बढ़कर एक सभी रचनाएँ आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी....रचना के लिए बधाई स्वीकारें !!!!!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 12 -04-2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में .....चिमनी पर टंगा चाँद .

expression ने कहा…

नयी पुरानी हलचल से आपके ब्लॉग तक पहुंची.........
बहुत खूबसूरत रचनाओं का खजाना पाया....

सादर.
अनु

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

हुनर है - इस गरीब के पास

ऐसा कि

जिस आग से वह घर बचाता है

उसी आग से

वह रोटी भी पकाता है।very nice.....

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

कविताओं की भाव-भूमि अनुभूति की सच्चाई पर आधारित है इसलिये मन तक संप्रेषित हो जाती हैं !

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहतरीन कविता है सर!


सादर

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर रचनायें।

दीपिका रानी ने कहा…

वाह! बेहद खूबसूरत और मन को छूती कविताएं

Saras ने कहा…

सुरेशजी आपकी सभी रचनायें बहुत सुन्दर हैं ....दर्द से नम....और बिछोह से तड़पती आपकी रचनायें ....अंत:कारण को छील गयीं ...!

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

तीन तीन मन को छूती हुयी रचनाएं पढवाने के लिए आभार

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत-बहुत ही अच्छी भावपूर्ण रचनाये है......

पंछी ने कहा…

dil ko chune vali behad sundar rachnaye..

सुमित प्रताप सिंह Sumit Pratap Singh ने कहा…

सुन्दर कविताएँ...

ढाई घर ने कहा…

suresh bhai aapki rachnaye bahut hi sundar aur bhavpoorna hain...bhadhai sweekaren

mridula pradhan ने कहा…

ek se badhkar ek.....